राजनीति, जातिवाद और लोकतंत्र
  • मध्य प्रदेश Post by Admin on 22-08-2022 12:11:23am
राजनीति, जातिवाद और लोकतंत्र

*देश में राजनीतिक रूप से पोषित जातिवाद किसी व्यक्ति विशेष द्वारा अपनी जाति को सर्वश्रेष्ठ मानना या जाति के प्रति निष्ठा रखना ही जातिवाद है।* हम कह सकते हैं कि भारत में जातिवाद की शुरुआत आज से लगभग 2000 वर्ष पूर्व हुई थी ।जो आज तक चली आ रही है जातिवाद के कारण राष्ट्रीय एकता, सामाजिक एकता एवं संप्रभुता या संपूर्ण एकता प्रभावित होती है ।जातिवाद ही वह जहर है जो किसी भी देश एवं समाज की एकता को तोड़ता है। जातिवाद का प्रचलन केवल भारत देश में ही नहीं है बल्कि अन्य देशों में भी है। हालांकि जातिवाद को कम करने के लिए संविधान में अनुच्छेद 15(A) एवं अनुच्छेद 15 (बी) जिसमें साफ तौर पर वर्णित हैं कि धर्म लिंग एवं जन्म स्थान के आधार पर किसी भी भारतीय नागरिक से भेदभाव नहीं किया जा सकता ।साथ ही किसी भी सार्वजनिक दुकानों रेस्टोरेंट पब्लिक एंटरटेनमेंट व होटलों में जाने से नहीं रोका जा सकता है। ऐसे ही सार्वजनिक हुए टैंक एवं नहाने के घाट के उपयोग पर भी नहीं रोक सकते हैं। भारत में जातिवाद की उत्पत्ति के पीछे कई सिद्धांत है जिसमें प्रमुख रुप से ऋग्वेद के अनुसार समाज को विभिन्न श्रेणियों में बांटा गया है ।माना यह भी जाता है कि अंग्रेजों ने भारत के स्वदेशी धर्मों की एक स्वीकृति सूची का निर्माण किया था जिसमें हिंदू सिख एवं जैन समुदाय के लोगों को शामिल किया गया था। समाज में कालांतर से चली आ रही जातिवाद के कारण लोगों में भेदभाव की भावना उत्पन्न हुई है।जिसका समाज पर बेहद बुरा प्रभाव पड़ता है जातिवाद में एक जाति के लोग स्वयं को दूसरे जाति के लोगों से श्रेष्ठ मानने लगते हैं जिससे समाज में तनाव की स्थिति निर्मित होती है ।देश की आजादी के बाद लोकतंत्र में राजनीतिक विचारधारा के लोगों ने समाज को दलगत राजनीति के साथ-साथ समाज में जातिगत समीकरण बैठाने का भी काम किया है। हालांकि मंच और सार्वजनिक स्थानों पर उनकी बोली और भाषा ऐसी होती है मानो देश में जातिवाद है ही नहीं ! उसके उलट लोकतांत्रिक प्रणाली की बहाली के लिए आम चुनावों में सभी राजनीतिक पार्टियों के प्रत्याशी क्षेत्र में जातिगत समीकरण के आधार पर तय किए जाते हैं। हम अंतर्मन से जातिवाद को अपने फायदे के लिए भुनाना चाहते हैं ।जब तक राजनीतिक पार्टियों की कथनी और करनी में अंतर रहेगा तब तक जातिवाद के दंश से समाज को बचा पाना कठिन ही नहीं असंभव होगा। हालांकि समय के साथ-साथ देश में बदलाव की शुरुआत हो चुकी है इन 76 वर्षों में जातिवाद के नासूर का इलाज होना चाहिए था वह राजनीतिक संरक्षण के चलते नहीं हो सका। आज भी देश के विभिन्न प्रांतों में जातिवाद के मुखर होने से सामाजिक घटनाएं देखने और सुनने को मिल ही जाती है। जाति प्रथा एक सामाजिक कुरीति है। लेकिन स्वार्थी राजनीतिज्ञों के कारण जातिवाद ने पहले से भी अधिक भयंकर रूप धारण कर लिया है। जिससे सामाजिक कटुता बड़ी है राजनीतिक रूप से राजनीतिक नेतृत्व में इस सामाजिक बुराई को खत्म करने का दिखावा तो किया जाता है । लेकिन इच्छाशक्ति और इमानदारी से इस बुराई को समाप्त करने से परहेज भी रखा गया है राजनीतिक व्यक्तियों या नेतृत्व को जातिवादी संस्थाओं संगठनों और आयोजनों से दूर रहना चाहिए। सरकार द्वारा जातिवादी संगठनों सभाओं और आयोजनों को हतोत्साहित करने वाले की भी जरूरत है लेकिन भारतीय राजनीति में आज भी महान व्यक्तियों को एक जाति विशेष तक ही सीमित रखने की कोशिश की जाती है। भारत देश में कुल जातियों की संख्या 6743 है इसमें उपजातियां शामिल नहीं है ।कतिपय विद्वानों की यह मान्यता है कि लोकतांत्रिक एवं प्रति निद्यातमक संस्थाओं की स्थापना के बाद जाति व्यवस्था लोप हो जाना चाहिए थी । लेकिन कुछ विद्वानों की मानें तो उनका कहना है ।कि जाति व्यवस्था परंपरागत शक्ति के रूप में कार्य करती है तथा राजनीतिक विकास एवं आधुनिकीकरण के मार्ग में बाधक है ।लेकिन वस्तुतः यह मान्यताएं सही नहीं है यदि हमारा प्रश्न यह है कि भारत में जाति का लोप हो रहा है अर्थ शून्य है। *राजनीति में जातिवाद का अर्थ जाति का राजनीतिकरण है।* आज देश को जातिवाद के बढ़ते प्रभाव ने कई दुष्परिणामों को जन्म दिया है इसके कारण राजनीतिक संस्थाओं में विकृति आ गई जिन कार्यों के लिए उनका गठन हुआ था ।वे कार्य और मान्यताएं गौड़ हो गई ।और जातियां प्रमुख हो गई ।इतना ही नहीं भारत की राष्ट्रीय एकता की भावना प्रभावित हुई है । *राष्ट्रीय एकता के मार्ग में जातिवाद बाधक बन गया* *जातिवाद ने लोक प्रशासन को भी दूषित किया है आज नतीजा यह है कि शासकीय पदों पर नियुक्ति के समय योग्यता के स्थान पर जाति को अधिक महत्व दिया जाने लगा है इससे प्रशासन की क्षमता प्रभावित हुई है* जातिवादी भावना से अनेक स्थानों पर उग्र एवं हिंसात्मक संघर्ष होने लगे हैं राजनीतिक दलों द्वारा जातिवाद को परोक्ष रूप से मान्यता देने के कारण समाज में व्याप्त शोषण एवं असमानता को मान्यता मिली है। सरकार को सभी लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष एवं जाति निरपेक्ष दलों को जातिवाद को प्रोत्साहन नहीं देने का निर्णय करना चाहिए। साथ ही सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त शिक्षा संस्थाओं, प्रतिनिधि ,निकायों, तथा सार्वजनिक संस्थाओं के जाती बोधक नामों को समाप्त करने की पहल करनी चाहिए। ऐसा कानून बनाना होगा जिससे जाति के नाम पर बनी संस्थाओं पर प्रतिबंधात्मक प्रतिबंध लग सके । *भारतीय राजनीति में जाति की विशेष भूमिका रही है तथापि लोकसभा तथा विधानसभा के चुनावों में भारतीय मतदाता यद्यपि राष्ट्रीय नीतियों तथा कार्यक्रमों के आधार पर ही अपना मत देते हैं ।लेकिन स्थानीय निकाय चुनाव में आज भी जातिवाद की राजनीति का प्रभुत्व है।* *************""**************************************** (मुकेश मिश्रा स्वतंत्र लेखक9826238512) (प्रसारित लेख में विचार लेखक के हैं किसी व्यक्ति का सहमत होना आवश्यक नहीं है ।)

राजनीति, जातिवाद और लोकतंत्र

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