- Post by Admin on 23-09-2022 03:48:21pm
आलू की तरह पौधे पर चढ़ानी होती है मिट्टी, तेजी से बढ़ता है पौधा -बीज का रोगोपचार करने से पौधे में नहीं लगता कीड़ा, ज्यादा हो जाती है पैदावार ****************************************************** भिण्ड (मुकेश मिश्रा)/ जिले में सरसों की खेती अधिकांश किसानों को आर्थिक आधार है। इस बार कम वर्षा हुई हे इस लिए सरसों की बंपर पैदावार के चांस है। परंपरागत पद्धति हटकर तो किसान एक हैक्टेयर में ६० क्विंटल तक उत्पादन ले सकते हैं। मेहगांव क्षेत्र के कुछ किसानों ने इस विधि को अपना भी लिया है। अन्य किसान भी विधि अपनाकर लाभ उठा सकते हैं। यहां पर बता देें कि इसी सप्ताह से सरसों की बोअनी शुरू हो जाएगी। जिस खेत में श्री विधि से सरसों की रोपाई करना हो उस खेत में पर्याप्त नमी होनी चाहिए। यदि खेत सूखा है तो सिंचाई (पलेवा सिंचाई) करके जुताई कर मिट्टी को भुरभुरा बना लें तथा खरपतवार खेत से बाहर कर दें। 1 एकड़ खेत हेतु 50 से 60 क्ंिवटल कम्पोस्ट खाद में 4 से 5 कि.ग्रा. ट्राइकोडर्मा, 27 कि.ग्रा. डीएपी, एवं 13.5 कि.ग्रा. म्यूरेट आफ पोटाश को अच्छी तरह मिला लें तथा गड्ढे में बराबर मात्रा में इस खाद को डालकर 1 दिन के लिए छोड़ दें। डीएपी के स्थान पर तत्व के अनुपात में सुपर फास्फेट एवं यूरिया अथवा नत्रजन युक्त खाद का भी उपयोग किया जा सकता है। खेत में धान की तरह पौध की रोपाई कर दें। रोपाई के 15 से 20 दिन के अंदर पहली सिंचाई की जानी चाहिए। सिंचाई के 3 से 4 दिन बाद जब खेत में चलने लायक हो जाये तब 3 से 4 क्ंिवटल वर्मीकम्पोस्ट में 13.5 किग्रा. यूरिया मिलाकर जड़ों के समीप देकर कुदाल या खुरपा अथवा बीडर चला दें। दूसरी सिंचाई समान्यत: पहली सिंचाई के 15 से 20 दिन बाद करते हैं सिंचाई के पश्चात रोटरी बीडर/कोनीबीडर अथवा कुदाल से खेत की गुड़ाई आवश्यक है। रोपाई के 30 दिन बाद से पोधे तेजी से बड़े होते हैं। साथ ही नई शाखाएं भी निकलती रहती हैं इसके लिए पौधों को अधिक नमी एवं पोषण की जरूरत होती है ४५ दिन बाद आवश्यकतानुसार तीसरी सिंचाई करें। सिंचाई के 3 से 4 दिन पश्चात जब खेत में चलने लायक हो जाये तब 13.5 किग्रा. यूरिया एवं 13.5 किग्रा. पोटाश को वर्मीकम्पोस्ट मेें मिलाकर डाले। मिट्टी चढ़ाने से पौधे के फैलाव करने में मदद मिलती है । जिस प्रकार आलू की फसल में मिट्टी चढ़ाते हंै ठीक उसी प्रकार से कतार से कतार 1 फिट ऊंचाई तक श्री विधि से सरसों की खेती में भी मिट्टी चढ़ाना आवश्यक है। इस विधि से सरसों की रोपण तैयारी कर 15 से 20 दिन तक की स्वस्थ्य पौध 3&3 फीट पर रोपाई की जाती है। इस विधि से किसान एक हैक्टेयर में ६० क्विंटल तक पैदावार ले चुके हंै। उपयोगी किस्में- इस पद्धति से सरसों की खेती करने के लिए पूसा वरुणा, पूसा जय किसान, पूसा गोल्ड जैसी किस्में उत्तम पाई गई हैं। रोपणी तैयार करने की विधि (1) शोधन -250 ग्राम बीज को 500 मिली. गुनगुने पानी में डालकर बीज की छंटाई की जाती है। -छंटाई किए गए बीज को 500 मि.ली. ग्राम केंचुआ खाद एवं 100 ग्राम गुड़ में मिलाकर 6 घंटे की अवधि हेतु शोधन के लिए छाया में रखा जाता है। -इसके बाद बीज को निथारकर 2 ग्राम कार्बेन्डाजिम/कार्बोक्सिन फफूंदनाशक बीजोपचार करके, कपड़े की पोटली में 12 घंटे बांधकर अंकुरण हेतु रख दिया जाता है। (2) रोपणी की बुआई -नर्सरी को जमीन से 15 सेमी. ऊंचाई, 1 मीटर चौड़ाई तथा आवश्यकतानुसार लंबाई 10 सेमी. मोटाई में वर्मी कम्पोस्ट/नाडेप कम्पोस्ट/कीट कम्पोस्ट को मिट्टी में मिलाकर तैयार करें। -शोधित एवं उपचारित बीज को पतली तह एवं बराबर दूरी पर नर्सरी में पौध उगाने हेतु डाला जाता है। -नर्सरी में बीज उगने के उपरांत उसके ऊपर पतली सी तह वर्मी कम्पोस्ट की डाल दी जाती है तथा पलवार से पौधों के उगने तक ढंक दिया जावे एवं समय-समय पर झारे से पानी का छिडक़ाव करें। (3) पौध की एसएमआई. विधि से रोपाई -नर्सरी 15 से 20 दिन में पौध रोपने हेतु तैयार हो जाती है। -पौध की दूरी व कतार से कतार की दूरी 3 फीट संधारित करते हुए एक-एक पौध की रोपाई करें। -रोपाई उपरांत जीवन रक्षक सिंचाई दिया जाना अति आवश्यक है। -कोनोबीटर या हेण्ड व्हील हो या रोटरी बीडर चलाकर गुड़ाई की जाना अतिआवश्यक है। ऐसा करने से निम्नानुसार लाभ होते हैं। खरपतवार नियंत्रण होता है। -भूमि भुरभुरी होती है व इसमें वायु संचार बढ़ता है जिससे जड़ों का अच्छा विकास होता है। -पौधों पर स्वत: ही मिट्टी चढ़ जाती है, जिससे उनका भूमि में स्थायित्व सुदृढ़ होता है। (5) पौध पोषण प्रबंधन अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद या वर्मी कम्पोस्ट 2.5 टन/हेक्टेयर की दर से अंतिम बखरनी के समय मिट्टी में मिलाएं। -नत्रजन,स्फुर, पोटाश, सल्फर का अनुपात 60-40- 20-25 कि.ग्रा./ हैक्टयर की दर डालें। नत्रजन की आधी मात्रा बुवाई से पूर्व खेत तैयार करते समय व आधी मात्रा सिंचाई के समय दी जाती है । - सिंचाई प्रबंधन रोपाई के 15-20 दिन बाद आवश्यकतानुसार सिंचाई करें। कथन श्रीविधि से सरसो की बोअनी करने से पैदावार ज्यादा होती है। इसके अलावा कीट लगने का खतरा भी कम हो जाता है। विभाग के कर्मचारियों से इस संबंध में जानकारी ली जा सकती है। किसानों के लिए ये बेहद फायदेमंद है। -शिवराजसिंह यादव उपसंचालक किसान कल्याण विभाग भिण्ड -----------

